ईरान में महासंग्राम: क्या गिरने वाली है खामेनेई की सत्ता? 2026 के विद्रोह की पूरी कहानी

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ईरान में महासंग्राम: क्या गिरने वाली है खामेनेई की सत्ता? 2026 के विद्रोह की पूरी कहानी

जनवरी 2026 की शुरुआत दुनिया के लिए एक बड़ी हलचल लेकर आई है। मध्य पूर्व का सबसे शक्तिशाली देश ईरान इस समय अपने इतिहास के सबसे बड़े जन-विद्रोह से गुजर रहा है। सड़कों पर जलते टायर, ‘तानाशाह का नाश हो’ के नारे और सुरक्षाबलों की भारी तैनाती—ये तस्वीरें आज के ईरान की हकीकत हैं। जो प्रदर्शन 28 दिसंबर 2025 को केवल बढ़ती महंगाई के खिलाफ शुरू हुए थे, वे अब एक पूरी सत्ता परिवर्तन की लहर बन चुके हैं।

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आइए, विस्तार से समझते हैं कि आखिर ईरान में क्या हो रहा है और इसका दुनिया पर क्या असर पड़ेगा।


1. क्यों भड़की है बगावत की आग? (मुख्य कारण)

ईरान के लोग अचानक सड़कों पर क्यों उतरे? इसके पीछे कोई एक कारण नहीं, बल्कि कई सालों का जमा हुआ गुस्सा है:

  • आर्थिक तबाही और रिकॉर्ड महंगाई: ईरान की मुद्रा ‘रियाल’ (Rial) इतिहास के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई है। महंगाई 60% के पार है और बैंक खाली हो चुके हैं (Bank Run)। लोगों के पास बुनियादी राशन खरीदने के लिए भी पैसे नहीं बचे हैं।
  • 2025 का युद्ध और उसका असर: जून 2025 में इजरायल और ईरान के बीच हुए सीधे सैन्य टकराव ने ईरान की कमर तोड़ दी। ईरान के परमाणु ठिकानों और बुनियादी ढांचे पर हुए हमलों ने देश को आर्थिक रूप से दशकों पीछे धकेल दिया।
  • सब्सिडी का खत्म होना: सरकार ने 2026 के बजट में अनाज और ईंधन पर मिलने वाली सब्सिडी को लगभग खत्म कर दिया, जिससे आम जनता का जीना मुहाल हो गया।
  • दमनकारी शासन: महिलाएं और युवा वर्ग 2022 के ‘महसा अमीनी’ आंदोलन के समय से ही कट्टरपंथी कानूनों से परेशान थे। इस बार यह गुस्सा आर्थिक बदहाली के साथ मिलकर एक ज्वाला बन गया है।

2. प्रदर्शनों का विस्तार: 180 शहरों में कोहराम

यह कोई छोटा विरोध नहीं है। मानवाधिकार संगठनों के अनुसार, प्रदर्शन ईरान के सभी 31 प्रांतों और 180 से अधिक शहरों में फैल चुके हैं।

  • तेहरान का ग्रैंड बाज़ार: प्रदर्शनों की शुरुआत तेहरान के व्यापारियों से हुई, जो मुद्रा की गिरावट से परेशान थे। अब इसमें छात्र, मजदूर और मध्यम वर्ग भी शामिल हो गया है।
  • इंटरनेट ब्लैकआउट: 8 जनवरी 2026 से ईरान सरकार ने पूरे देश में इंटरनेट और टेलीफोन सेवाओं पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया है ताकि दुनिया को वहां की असली तस्वीरें न मिल सकें। नेटब्लॉक्स (NetBlocks) के अनुसार, ईरान इस समय ‘डिजिटल अंधेरे’ में है।
  • भारी हिंसा: अब तक 200 से अधिक लोगों की मौत की खबरें हैं (अकेले तेहरान में 217 मौतों का दावा किया जा रहा है), और हजारों लोगों को गिरफ्तार किया गया है।

3. रजा पहलवी और ‘राजशाही’ की वापसी की मांग

इस बार के प्रदर्शनों में एक बड़ा बदलाव देखने को मिला है। ईरान के अंतिम शाह के बेटे, प्रिंस रजा पहलवी, ने निर्वासन से जनता को संगठित होने का आह्वान किया है। प्रदर्शनकारी “शाह अमर रहें” और “पहलवी वापस आओ” के नारे लगा रहे हैं। यह संकेत देता है कि जनता अब केवल सुधार नहीं, बल्कि पूरी तरह से ‘इस्लामिक रिपब्लिक’ का अंत चाहती है।


4. वर्ल्ड कनेक्शन: दुनिया क्यों है चिंतित?

ईरान में हो रही इस उथल-पुथल का सीधा संबंध दुनिया की महाशक्तियों से है:

  • अमेरिका (ट्रंप प्रशासन): राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान सरकार को चेतावनी दी है कि अगर मासूमों का खून बहाया गया, तो अमेरिका चुप नहीं बैठेगा। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने भी ईरान के लोगों को खुला समर्थन दिया है।
  • इजरायल का रुख: इजरायल के लिए यह स्थिति ‘दुश्मन के कमजोर होने’ जैसी है। इजरायल चाहता है कि ईरान का ध्यान बाहरी युद्धों (जैसे लेबनान या सीरिया) से हटकर अपने घर को बचाने में लग जाए।
  • क्षेत्रीय गठबंधन: ईरान के साथी जैसे ‘हिजबुल्लाह’ और ‘हमास’ पहले से ही कमजोर हो चुके हैं। यदि ईरान में सत्ता गिरती है, तो पूरे मिडिल-ईस्ट का नक्शा और प्रभाव बदल जाएगा।

5. वैश्विक प्रभाव: दुनिया पर इसका क्या असर होगा?

ईरान संकट केवल एक देश की समस्या नहीं है, यह पूरी दुनिया को प्रभावित करेगा:

  1. कच्चे तेल की कीमतें (Oil Shock): ईरान तेल का बड़ा उत्पादक है। यदि वहां तेल का उत्पादन ठप होता है या हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) बंद होता है, तो पूरी दुनिया में पेट्रोल-डीजल की कीमतें आसमान छू सकती हैं।
  2. परमाणु खतरा: अस्थिरता के बीच यह डर भी है कि ईरान के परमाणु हथियार या सामग्री गलत हाथों में न पड़ जाए या सरकार दबाव में कोई आत्मघाती कदम न उठा ले।
  3. शरणार्थी संकट: अगर ईरान में गृहयुद्ध छिड़ता है, तो लाखों की संख्या में ईरानी नागरिक यूरोप और पड़ोसी देशों की ओर पलायन करेंगे, जिससे एक नया मानवीय संकट पैदा होगा।
  4. नया मिडिल-ईस्ट: ईरान में सत्ता परिवर्तन का मतलब होगा कि सीरिया, इराक और यमन में चल रहे छद्म युद्ध (Proxy Wars) खत्म हो सकते हैं, जिससे शांति की एक नई उम्मीद जग सकती है।

निष्कर्ष

ईरान इस समय बारूद के ढेर पर बैठा है। 2026 के ये प्रदर्शन केवल एक ‘दंगा’ नहीं, बल्कि ‘क्रांति’ की आहट हैं। क्या अयातुल्ला खामेनेई की सरकार इस तूफान को दबा पाएगी या ईरान एक नए युग की शुरुआत करेगा? यह आने वाले कुछ हफ्ते तय करेंगे। दुनिया की नजरें फिलहाल तेहरान की सड़कों पर टिकी हैं।

आपको क्या लगता है, क्या बाहरी देशों (जैसे अमेरिका) को ईरान के आंतरिक मामले में दखल देना चाहिए, या ईरान के लोगों को अपनी लड़ाई खुद लड़नी चाहिए? अपनी राय कमेंट में जरूर बताएं।

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