धर्म और देश के लिए सर्वोच्च बलिदान: गुरु गोविंद सिंह जी और चार साहिबजादों की अमर गाथा

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धर्म और देश के लिए सर्वोच्च बलिदान: गुरु गोविंद सिंह जी और चार साहिबजादों की अमर गाथा

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दिसंबर का महीना सिख इतिहास में ‘शोक’ का नहीं, बल्कि ‘अदम्य साहस’ और ‘शहादत’ का प्रतीक है। यह वही समय है जब गुरु गोविंद सिंह जी के पूरे परिवार ने मानवता और धर्म की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया था। आइए, तारीख-दर-तारीख जानते हैं कि 1704 के उस भयावह सप्ताह में क्या हुआ था।

1. आनंदपुर साहिब छोड़ना (20-21 दिसंबर, 1704)

मुगल सम्राट औरंगजेब की विशाल सेना और पहाड़ी राजाओं ने कई महीनों तक आनंदपुर साहिब के किले को घेरे रखा। उन्होंने कसम खाई थी कि यदि गुरु जी किला छोड़ दें, तो उन्हें सुरक्षित जाने दिया जाएगा। कसमों पर विश्वास कर गुरु जी ने 20 दिसंबर की रात किला छोड़ा, लेकिन मुगलों ने वादा खिलाफी करते हुए पीछे से हमला कर दिया।

2. सरसा नदी पर बिछड़ गया परिवार (21 दिसंबर, 1704)

भीषण ठंड और बारिश के बीच सरसा नदी उफान पर थी। युद्ध के दौरान गुरु जी का परिवार तीन हिस्सों में बिछड़ गया:

  • गुरु गोविंद सिंह जी और दो बड़े साहिबजादे (अजीत सिंह और जुझार सिंह) एक तरफ।
  • माता गुजरी जी और दो छोटे साहिबजादे (ज़ोरावर सिंह और फतेह सिंह) दूसरी तरफ।
  • माता सुंदरी जी और माता साहिब कौर जी दिल्ली की ओर।

3. चमकौर का युद्ध: दो बड़े साहिबजादों की शहादत (22-23 दिसंबर, 1704)

चमकौर की एक कच्ची गढ़ी (किलेनुमा घर) में गुरु जी के साथ केवल 40 सिख थे, जबकि सामने मुगलों की 10 लाख की सेना (इतिहासकारों के अनुसार) थी।

  • 22 दिसंबर: गुरु जी के बड़े सुपुत्र बाबा अजीत सिंह (18 वर्ष) रणभूमि में उतरे और वीरता से लड़ते हुए शहीद हुए।
  • उनके बाद बाबा जुझार सिंह (14 वर्ष) ने मैदान संभाला और उन्होंने भी वीरगति प्राप्त की। गुरु जी ने अपनी आँखों के सामने अपने बेटों को धर्म के लिए बलिदान होते देखा और अकाल पुरख का शुक्रिया अदा किया।

4. छोटे साहिबजादों की गिरफ्तारी और कचहरी (24-26 दिसंबर, 1704)

दूसरी ओर, माता गुजरी जी और छोटे साहिबजादों को उनके पुराने रसोइए ‘गंगू’ ने धोखा दिया और उन्हें सरहिंद के नवाब वजीर खान को पकड़वा दिया।

  • उन्हें सरहिंद के ‘ठंडा बुर्ज’ में रखा गया, जहाँ कड़कड़ाती ठंड में उनके पास ओढ़ने के लिए कुछ नहीं था।
  • 25 और 26 दिसंबर को नवाब ने साहिबजादों को अपनी कचहरी में बुलाया और इस्लाम कबूल करने के बदले धन-दौलत का लालच दिया, लेकिन नन्हे वीरों ने निडर होकर उसे ठुकरा दिया।

5. दीवार में जिंदा चुनवा देना (27 दिसंबर, 1704)

जब लालच काम नहीं आया, तो वजीर खान ने उन्हें मौत की सजा सुनाई।

  • 27 दिसंबर 1704: 7 साल के बाबा ज़ोरावर सिंह और 5 साल के बाबा फतेह सिंह को दीवार में जिंदा चुनवा दिया गया। जब दीवार उनके गले तक आई, तो साहिबजादे ‘वाहेगुरु’ का जाप करते हुए शहीद हो गए।
  • इसी दुखद समाचार को सुनकर माता गुजरी जी ने भी अपने प्राण त्याग दिए।

इतिहास के सुनहरे पन्ने: प्रमुख तिथियां (Summary Table)

तारीखघटनामहत्व
20-21 दिसंबरआनंदपुर साहिब का त्यागयुद्ध और परिवार का बिछड़ना
22 दिसंबरचमकौर का युद्धबड़े साहिबजादों का बलिदान
27 दिसंबरसरहिंद की दीवारछोटे साहिबजादों की शहादत
26 दिसंबरवीर बाल दिवसभारत सरकार द्वारा घोषित स्मृति दिवस

निष्कर्ष: “इन पुत्रन के शीश पर, वार दिए सुत चार”

गुरु गोविंद सिंह जी ने अपने पुत्रों के बलिदान के बाद कहा था, “इन पुत्रन के शीश पर वार दिए सुत चार, चार मुए तो क्या हुआ, जीवत कई हजार।” यानी मेरे चार बेटे शहीद हुए तो क्या, मेरे हजारों सिख मेरे बेटों के समान जीवित हैं।

आज का युवा वर्ग इन साहिबजादों की वीरता से प्रेरणा ले सकता है कि कैसे कम उम्र में भी अपने सिद्धांतों और धर्म के लिए अडिग रहा जाता है।

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