उन्नाव कांड: न्याय की लड़ाई से सजा तक, अब तक का पूरा अपडेट

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उन्नाव बलात्कार मामले ने न केवल उत्तर प्रदेश बल्कि पूरे देश की राजनीति और न्याय व्यवस्था को हिलाकर रख दिया था। 2017 से शुरू हुआ यह घटनाक्रम आज भी सुर्खियों में रहता है। आइए जानते हैं इस मामले में अब तक क्या-क्या हुआ और वर्तमान स्थिति क्या है।

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उन्नाव कांड: न्याय की लड़ाई से सजा तक, अब तक का पूरा अपडेट

1. मुख्य मामला: कुलदीप सिंह सेंगर और 2017 की घटना

यह मामला जून 2017 का है, जब एक नाबालिग लड़की ने तत्कालीन भाजपा विधायक कुलदीप सिंह सेंगर पर बलात्कार का आरोप लगाया था। लंबी लड़ाई के बाद 2019 में कोर्ट ने सेंगर को दोषी माना।

  • सजा की स्थिति: दिल्ली की तीस हजारी कोर्ट ने कुलदीप सिंह सेंगर को ‘उम्रकैद’ की सजा सुनाई थी। वह वर्तमान में दिल्ली की तिहाड़ जेल में बंद है।
  • जुर्माना: कोर्ट ने सेंगर पर 25 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया था, जो पीड़िता को मुआवजे के तौर पर दिया जाना था।
  • राजनीतिक कार्रवाई: विवाद बढ़ने के बाद भाजपा ने कुलदीप सेंगर को पार्टी से निष्कासित कर दिया था और उनकी विधानसभा सदस्यता भी रद्द कर दी गई थी।

2. पीड़िता के पिता की मौत और अन्य मामले

इस कांड में केवल बलात्कार ही नहीं, बल्कि पीड़िता के परिवार को खत्म करने की साजिश के भी आरोप लगे थे।

  • पिता की कस्टडी में मौत: पीड़िता के पिता को अवैध हथियार रखने के आरोप में जेल भेजा गया था, जहाँ पुलिस कस्टडी में उनकी बेरहमी से पिटाई के बाद मौत हो गई। इस मामले में भी कोर्ट ने सेंगर और उसके भाई अतुल सेंगर को 10 साल की सजा सुनाई है।
  • रायबरेली एक्सीडेंट: 2019 में पीड़िता की कार का रायबरेली में एक ट्रक के साथ एक्सीडेंट हुआ था, जिसमें उसकी चाची और मौसी की मौत हो गई थी। हालांकि, बाद में सीबीआई (CBI) जांच में इसे एक हादसा बताया गया था और हत्या की साजिश के सबूत नहीं मिले थे।

3. ताज़ा अपडेट (2024-2025)

हाल के महीनों में इस मामले में कुछ महत्वपूर्ण कानूनी मोड़ आए हैं:

  • जमानत याचिकाएं: कुलदीप सिंह सेंगर ने अपनी उम्रकैद की सजा को चुनौती देते हुए दिल्ली हाई कोर्ट में कई बार जमानत याचिकाएं दायर की हैं। समय-समय पर उसे बेटी की शादी या अन्य पारिवारिक कार्यक्रमों के लिए अंतरिम जमानत (Interim Bail) दी गई, लेकिन उसकी मुख्य सजा पर रोक लगाने से कोर्ट ने साफ इनकार कर दिया है।
  • सुप्रीम कोर्ट का कड़ा रुख: कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि ऐसे गंभीर मामलों में नरमी नहीं बरती जा सकती। पीड़िता और उसके परिवार को अभी भी सरकारी सुरक्षा दी जा रही है।
  • पॉक्सो (POCSO) एक्ट का महत्व: यह मामला भारत में पॉक्सो एक्ट के सख्त क्रियान्वयन के लिए एक मिसाल बना, जहाँ एक ताकतवर नेता को कानून के कठघरे में खड़ा किया गया।

4. अन्य संबंधित मामले (दिसंबर 2019 की घटना)

उन्नाव में ही एक और वीभत्स मामला हुआ था जहाँ एक बलात्कार पीड़िता को कोर्ट जाते समय आरोपियों ने जिंदा जला दिया था।

  • अपडेट: इस मामले में भी पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए सभी आरोपियों को जेल भेजा। फास्ट ट्रैक कोर्ट में इस पर सुनवाई चल रही है ताकि आरोपियों को कड़ी से कड़ी सजा मिल सके।

उन्नाव कांड और व्यवस्था: सरकार और न्यायपालिका की भूमिका पर एक विश्लेष

उन्नाव की घटनाओं ने समय-समय पर हमारे लोकतंत्र के तीन मुख्य स्तंभों—प्रशासन, पुलिस और न्यायपालिका—की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। जब हम सरकार और कोर्ट के कामकाज का विश्लेषण करते हैं, तो तस्वीर के दो पहलू सामने आते हैं।

सरकार और प्रशासन: सुरक्षा या लापरवाही?

सरकार की भूमिका पर सबसे बड़ा सवाल “त्वरित कार्रवाई” को लेकर उठता है।

  • देरी से कार्रवाई: कुलदीप सिंह सेंगर के मामले में यह देखा गया कि आरोपी सत्ताधारी दल का हिस्सा था, जिसके कारण शुरुआत में FIR दर्ज करने और कार्रवाई करने में काफी समय लगा। जब पीड़िता ने मुख्यमंत्री आवास के सामने आत्मदाह की कोशिश की, तब जाकर मामला सुर्खियों में आया और प्रशासन जागा। यह सत्ता के संरक्षण में पल रहे अपराधियों के प्रति सरकारी ढिलाई को दर्शाता है।
  • पुलिस की भूमिका: स्थानीय पुलिस की भूमिका अक्सर संदिग्ध रही है। पीड़िता के पिता पर झूठा केस दर्ज करना और कस्टडी में उनकी मौत होना पुलिसिया तंत्र की विफलता का सबसे काला अध्याय है।
  • वर्तमान सुधार: हालांकि, बाद के सालों में सरकार ने ‘एंटी-रोमियो स्क्वाड’ और ‘मिशन शक्ति’ जैसे अभियान चलाए हैं, लेकिन उन्नाव जैसी घटनाएं यह बताती हैं कि ज़मीनी स्तर पर पुलिस और रसूखदारों का गठजोड़ अभी भी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है।

न्यायपालिका (Court): उम्मीद की किरण या तारीखों का जाल?

न्यायपालिका के खिलाफ जनता में अक्सर इस बात को लेकर नाराजगी रहती है कि न्याय मिलने में बहुत समय लगता है।

  • देरी का दर्द: भारत में बलात्कार जैसे जघन्य अपराधों में भी फैसले आने में सालों लग जाते हैं। उन्नाव की दूसरी घटना, जिसमें पीड़िता को जिंदा जला दिया गया था, यह दर्शाती है कि अगर आरोपियों को तुरंत सजा का डर होता, तो वे इतना दुस्साहस नहीं करते।
  • सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप: इस मामले में न्यायपालिका की सबसे बड़ी जीत तब दिखी जब सुप्रीम कोर्ट ने संज्ञान लिया और केस को उत्तर प्रदेश से दिल्ली ट्रांसफर किया। कोर्ट की सख्ती के कारण ही कुलदीप सेंगर जैसे ताकतवर व्यक्ति को उम्रकैद हुई। यह साबित करता है कि जब ऊपरी अदालतें सक्रिय होती हैं, तो न्याय मुमकिन है।
  • अपील और बेल का खेल: कोर्ट के खिलाफ एक बड़ी टिप्पणी यह भी होती है कि दोषी अक्सर अपनी पहुंच और वकीलों के माध्यम से ‘जमानत’ (Bail) या ‘तारीख’ का खेल खेलते हैं, जिससे पीड़िता का परिवार मानसिक रूप से टूट जाता है।

निष्कर्ष: क्या बदल रहा है?

आज की स्थिति को देखें तो सरकार ने कानूनों को सख्त (जैसे पॉक्सो एक्ट में बदलाव) तो किया है, लेकिन उन कानूनों को लागू करने वाला तंत्र (Police) अभी भी राजनीतिक दबाव से मुक्त नहीं है। कोर्ट ने दोषियों को सजा देकर एक नजीर तो पेश की है, लेकिन “न्याय में देरी, न्याय न मिलने के बराबर है” (Justice delayed is justice denied) वाली कहावत आज भी उन्नाव की गलियों में गूँजती है।

जब तक रसूखदारों को यह डर नहीं होगा कि कानून उन्हें तुरंत और कठोर सजा देगा, तब तक व्यवस्था पर सवाल उठते रहेंगे।

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